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Assam News: Flood Water Purifier ने दिखाई नई उम्मीद, बाढ़ के गंदे पानी से मौके पर तैयार हो रहा पीने का पानी

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Alam Ki Khabar | Assam News | Flood News | Technology News | त्रिपुरा यूनिवर्सिटी समर्थित इंस्टावॉटर की पोर्टेबल वॉटर प्यूरीफिकेशन तकनीक बाढ़ के दूषित पानी को मौके पर साफ कर पीने योग्य पानी उपलब्ध कराने में मदद कर रही है।

डेस्क, गुवाहाटी, 9 अगस्त। आलम की खबर: बाढ़ के दौरान लोगों के सामने सिर्फ घर और फसल बचाने की चुनौती नहीं होती, बल्कि पानी उतरने के बाद पीने के साफ पानी का संकट भी गंभीर रूप ले लेता है। कुएं, तालाब, हैंडपंप और स्थानीय जलस्रोत बाढ़ के पानी, सीवेज और कचरे से दूषित हो जाते हैं। ऐसे समय में राहत शिविरों और दूर-दराज के गांवों तक बोतलबंद पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती बन जाता है। इसी समस्या के बीच त्रिपुरा यूनिवर्सिटी से समर्थित स्टार्टअप इंस्टावॉटर की पोर्टेबल वॉटर प्यूरीफिकेशन तकनीक चर्चा में आई है।

इस तकनीक को इस तरह विकसित किया गया है कि दूषित पानी के स्रोत के पास ही एक मोबाइल यूनिट स्थापित कर पानी को फिल्टर किया जा सके। यानी राहत एजेंसियों को हर जगह टैंकर या बोतलबंद पानी पहुंचाने पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय जलस्रोत से पानी लेकर उसे शुद्ध करने का विकल्प मिल सकता है।

स्टार्टअप की ओर से विकसित यह तकनीक पेटेंटेड बताई गई है और इसे बाढ़, आपदा या उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी माना जा रहा है जहां अचानक बड़े पैमाने पर सुरक्षित पेयजल की जरूरत पैदा हो जाती है।

बाढ़ के बाद पानी क्यों बन जाता है सबसे बड़ी चुनौती?

बाढ़ का पानी अपने साथ मिट्टी, कीचड़, कचरा और सीवेज लेकर आता है। जब यही पानी स्थानीय जलस्रोतों में पहुंचता है तो सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाला पानी भी दूषित हो सकता है। कई इलाकों में बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी कुओं और दूसरे स्रोतों का पानी तुरंत पीने योग्य नहीं रहता।

ऐसी स्थिति में सबसे ज्यादा चिंता जल-जनित बीमारियों को लेकर होती है। दूषित पानी से डायरिया, हैजा और अन्य संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और राहत शिविरों में रह रहे लोगों के लिए यह स्थिति और गंभीर हो जाती है।

इसी समस्या का समाधान तलाशने के लिए मोबाइल वॉटर प्यूरीफिकेशन जैसी तकनीक महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसका मूल विचार यह है कि पानी को लोगों तक ले जाने के बजाय शुद्ध करने वाली मशीन को पानी के स्रोत के पास ले जाया जाए।

त्रिपुरा यूनिवर्सिटी समर्थित स्टार्टअप की पहल

इंस्टावॉटर को त्रिपुरा यूनिवर्सिटी का समर्थन प्राप्त है। स्टार्टअप ने एक ऐसी मोबाइल प्यूरीफिकेशन यूनिट विकसित की है, जिसे जरूरत के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर ले जाया जा सकता है।

जानकारी के अनुसार, हाल में टीम असम के अमगुरी क्षेत्र में पहुंची थी। वहां यूनिट की मदद से करीब 2,000 लीटर दूषित पानी को शुद्ध किया गया। इससे 30 से अधिक परिवारों को पेयजल उपलब्ध कराने में मदद मिली।

इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बाढ़ प्रभावित गांवों में राहत सामग्री पहुंचाना हमेशा आसान नहीं होता। सड़कें डूबने, परिवहन बाधित होने और स्थानीय संसाधनों पर दबाव बढ़ने के कारण बोतलबंद पानी की नियमित आपूर्ति मुश्किल हो सकती है।

अगर किसी प्रभावित क्षेत्र में पानी को मौके पर ही शुद्ध करने की व्यवस्था उपलब्ध हो, तो राहत कार्यों का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय स्तर पर पूरा किया जा सकता है।

कैसे काम करती है मोबाइल यूनिट?

इंस्टावॉटर की यूनिट में पंप की व्यवस्था बताई गई है। यह पंप बाढ़ या किसी अन्य दूषित स्रोत से पानी खींचता है। इसके बाद पानी को अलग-अलग फिल्ट्रेशन चरणों से गुजारा जाता है।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य पानी में मौजूद मिट्टी, कीचड़ और अन्य बारीक कणों को अलग करना है। इसके बाद पानी को आगे की शुद्धिकरण प्रक्रिया से गुजारा जाता है, ताकि उसमें मौजूद हानिकारक तत्वों और सूक्ष्मजीवों को कम या हटाया जा सके।

स्टार्टअप के अनुसार, पूरी प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय पेयजल मानकों और WHO के निर्धारित मानकों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।

हालांकि किसी भी आपदा क्षेत्र में तैयार पानी को पीने योग्य घोषित करने से पहले स्थानीय परिस्थितियों और पानी की गुणवत्ता की जांच महत्वपूर्ण रहती है। अलग-अलग जलस्रोतों में प्रदूषण का स्तर अलग हो सकता है, इसलिए तकनीकी शुद्धिकरण के साथ गुणवत्ता परीक्षण भी जरूरी है।

एक मशीन, कई परिवारों तक पानी

इस तकनीक की सबसे बड़ी उपयोगिता इसकी पोर्टेबिलिटी है। मशीन को किसी एक स्थायी स्थान पर स्थापित रखने के बजाय आवश्यकता के अनुसार प्रभावित क्षेत्र में ले जाया जा सकता है।

बाढ़ के दौरान जिन इलाकों में हजारों लोगों को सुरक्षित पानी की जरूरत होती है, वहां ऐसी मोबाइल यूनिट राहत व्यवस्था के लिए अतिरिक्त विकल्प तैयार कर सकती है।

विशेष रूप से ऐसे गांवों में जहां पाइपलाइन या जलापूर्ति व्यवस्था बाढ़ से प्रभावित हो गई हो, वहां स्थानीय जलस्रोत का उपचार कर उपयोगी बनाने की संभावना राहत कार्यों को आसान कर सकती है।

असम जैसे बाढ़ प्रभावित राज्य में इस तरह की तकनीक का प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि हर साल कई इलाकों में बाढ़ के कारण सामान्य जनजीवन प्रभावित होता है। सड़क और परिवहन व्यवस्था बाधित होने पर पीने का पानी पहुंचाना अपने आप में बड़ी चुनौती बन जाता है।

2,000 लीटर पानी शुद्ध करने का दावा

अमगुरी में किए गए हालिया प्रयास में इंस्टावॉटर की टीम ने अपनी यूनिट से करीब 2,000 लीटर पानी को शुद्ध करने का काम किया। इस पहल में स्टार्टअप के संस्थापक प्रोफेसर हरजीत नाथ, एम.टेक छात्र असीम और टेक्निशियन शांतनु शामिल रहे।

टीम का उद्देश्य सिर्फ पानी उपलब्ध कराना नहीं था, बल्कि बाढ़ प्रभावित लोगों को स्थानीय स्तर पर सुरक्षित पेयजल का विकल्प देना था।

30 से अधिक परिवारों को इस प्रयास से लाभ मिलने की जानकारी सामने आई है। इससे यह संकेत मिलता है कि आपदा के समय मोबाइल जल शोधन इकाइयां छोटे स्तर पर तत्काल राहत पहुंचाने में उपयोगी हो सकती हैं।

बोतलबंद पानी की निर्भरता कम करने की कोशिश

आपदा के दौरान सबसे सामान्य समाधान प्रभावित लोगों तक बोतलबंद या टैंकर का पानी पहुंचाना होता है। लेकिन बड़े पैमाने पर यह व्यवस्था महंगी होने के साथ-साथ लॉजिस्टिक चुनौती भी बन जाती है।

दूर के गांवों तक पानी पहुंचाने के लिए वाहन, ईंधन, सड़क और वितरण व्यवस्था की जरूरत होती है। यदि सड़कें बाढ़ में डूबी हों तो समस्या और बढ़ जाती है।

मोबाइल प्यूरीफिकेशन यूनिट इस मॉडल को बदलने की कोशिश करती है। इसमें पानी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के बजाय शोधन प्रणाली को पानी के स्रोत के करीब पहुंचाया जाता है।

हालांकि बड़े स्तर पर इसके इस्तेमाल के लिए मशीन की क्षमता, बिजली या ईंधन की आवश्यकता, फिल्टर की उपलब्धता, रखरखाव और शुद्ध पानी की नियमित गुणवत्ता जांच जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा।

आपदा प्रबंधन में नई भूमिका की संभावना

बाढ़ के अलावा ऐसी मोबाइल तकनीक भूकंप, चक्रवात, भूस्खलन या अन्य आपदाओं के बाद भी उपयोगी हो सकती है, जहां स्थानीय पेयजल व्यवस्था प्रभावित हो जाती है।

यदि राहत एजेंसियों, स्थानीय प्रशासन और आपदा प्रबंधन टीमों के पास ऐसी पोर्टेबल यूनिट उपलब्ध हों, तो शुरुआती घंटों में सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने के विकल्प बढ़ सकते हैं।

इंस्टावॉटर की पहल इसी दिशा में एक तकनीकी समाधान के रूप में सामने आई है। फिलहाल इसका इस्तेमाल सीमित स्तर पर हुआ है, लेकिन बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में इसके संभावित उपयोग को देखते हुए ऐसी स्वदेशी तकनीक पर आगे काम महत्वपूर्ण हो सकता है।

बाढ़ के बाद साफ पानी की उपलब्धता सिर्फ सुविधा का सवाल नहीं है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और राहत व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि दूषित स्थानीय जलस्रोत को सुरक्षित तरीके से उपचारित कर वहीं उपयोग योग्य बनाया जा सके, तो आपदा के दौरान लोगों की एक बड़ी जरूरत को स्थानीय स्तर पर पूरा करने में मदद मिल सकती है।

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बाढ़ में पानी बचाना ही नहीं, सुरक्षित बनाना भी सबसे बड़ी चुनौती

बाढ़ की तस्वीरों में आमतौर पर डूबे हुए घर, सड़कें और खेत दिखाई देते हैं, लेकिन असली संकट पानी उतरने के बाद सामने आता है। जिस पानी से बाढ़ आती है, वही पानी कई बार स्थानीय पेयजल स्रोतों को भी संक्रमित कर देता है। यही वजह है कि आपदा प्रबंधन में भोजन और दवाइयों के साथ सुरक्षित पेयजल को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पोर्टेबल वॉटर प्यूरीफिकेशन जैसी तकनीक इसी समस्या का तकनीकी समाधान पेश करती है। यदि किसी गांव में उपलब्ध पानी को उचित प्रक्रिया और गुणवत्ता परीक्षण के बाद वहीं शुद्ध किया जा सके, तो राहत सामग्री की निर्भरता कुछ हद तक कम हो सकती है।

लेकिन तकनीक को सफल बनाने के लिए सिर्फ मशीन पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षित ऑपरेटर, नियमित फिल्टर बदलना, बिजली या ऊर्जा की व्यवस्था, पानी की गुणवत्ता की जांच और स्थानीय प्रशासन का सहयोग भी जरूरी होगा।

इंस्टावॉटर का प्रयोग यह दिखाता है कि आपदा के समय स्थानीय संसाधनों को तकनीक की मदद से उपयोगी बनाया जा सकता है। भविष्य में ऐसी स्वदेशी प्रणालियों को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की स्थायी आपदा-तैयारी योजना से जोड़ा जाए तो संकट के शुरुआती दौर में हजारों लोगों तक सुरक्षित पानी पहुंचाने की क्षमता बढ़ सकती है।

बाढ़ को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके बाद पैदा होने वाले पेयजल संकट की तैयारी पहले से की जा सकती है। यही ऐसी तकनीक की सबसे बड़ी उपयोगिता हो सकती है।

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